एक लाइन में अगर आप Gadar जैसी “दुश्मन को चीर देने वाली” मसाला फिल्म की उम्मीद लेकर बैठे हैं, तो निराशा होगी; लेकिन अगर आप ऐसी विभाजन की फिल्म देखना चाहते हैं जो “इंसान” को “धर्म” और “सरहद” से ऊपर रखती है, तो यह टिकट की कीमत वसूल कराती है।**
कहानी क्या है
अगस्त 1947, मेरठ के मुस्लिम कारोबारी सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) भारत की आजादी का जश्न मना रहे हैं। लेकिन जश्न की मिठाई बाँटने से पहले ही दंगाइयों ने उनके घर को आग लगा दी। वह मजबूरन अपनी पत्नी हामिदा (प्रीति जिंटा), बेटी और बेटे जावेद (करण देओल) के साथ लाहौर भागते हैं। भगदड़ में बेटा जावेद स्टेशन पर बिछड़ जाता है।
लाहौर में, परिवार कई महीने शरणार्थी शिविर में काटने के बाद, दोस्त हबीब (अली फजल) की मदद से एक हवेली मिलती है। लेकिन जब वे दरवाजा खोलते हैं, तो अंदर पहले से एक बूढ़ी हिंदू विधवा दुर्गावती, यानी “माई” (शबाना आजमी) रह रही है। उसके बेटे का परिवार विभाजन के दंगों में लापता हो चुका है, और वह यादों से भरा यह घर छोड़ने को तैयार नहीं है।
सिकंदर का परिवार शुरू में उसे निकालने की कोशिश करता है। लेकिन धीरे-धीरे, विरोध से आदत, और आदत से लगाव बन जाता है—”माई” इस मुस्लिम परिवार में चाय बनाने वाली, जड़ी-बूटी देने वाली, बड़बड़ाने वाली बूढ़ी माँ बन जाती है। हामिदा उसे माँ मान लेती है, और सिकंदर उसमें अपनी खोई हुई माँ की छवि देखने लगता है।
फिर बेटा जावेद आता है। उसने भारत में मुसलमानों का कत्लेआम अपनी आँखों से देखा है, और गुस्से से भरा हुआ लौटा है। उसकी नज़र में “माई” कोई बेसहारा बूढ़ी औरत नहीं, बल्कि “दुश्मन” की नुमाइंदा है। वह स्थानीय कट्टरपंथी नेता याकूब (अभिमन्यु सिंह) के साथ मिलकर “माई” को बाहर निकालने की कोशिश शुरू करता है।
सिकंदर के सामने सवाल है: एक हिंदू बूढ़ी औरत की रक्षा करे, या अपने बेटे और पूरे समुदाय के सामने झुक जाए?
अच्छी बातें सनी देओल ने आखिरकार “सनी देओल” होना बंद कर दिया
इस फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज़ **सनी देओल** हैं। उन्होंने दशकों से “देशभक्त हीरो” वाला रोल किया है—Gadar में अकेले पाकिस्तानी सेना से लड़े, Borderमें “Hindustan Zindabad” चिल्लाया। लेकिन इस बार वह एक मुस्लिम शरणार्थी हैं, जो पाकिस्तान की ज़मीन पर, एक हिंदू बूढ़ी औरत की रक्षा करता है, अपने ही समुदाय के कट्टरपंथियों से लड़ता है।
The Hindu की समीक्षा बिल्कुल सही लिखती है: “संतोषी ने सनी के Gadar के बाद वाले चिल्लाने वाले हीरो वाले रूप को उतार दिया है, और उन्हें एक कमजोर मुस्लिम प्रवासी के रूप में गढ़ा है।” यह वह सनी नहीं हैं जो एक मुक्के से भीड़ को उड़ा देते हैं—यह वह सनी हैं जो अफसरों से गुहार लगाते हैं, रोते हैं, और अपनी “नरम आँखों” से एक्टिंग करते हैं। Cinema Express ने सीधे इसे “उनके करियर की सबसे अच्छी परफॉर्मेंस” कहा है।
शबाना आजमी दूसरा स्तंभ हैं। उनकी “माई” कोई राजनीतिक प्रतीक नहीं, बस एक चाय बनाने वाली, रास्ता बताने वाली, “मेरा बेटा लौटेगा” बड़बड़ाने वाली बूढ़ी औरत है। The Hindu लिखती है: “जब दुश्मन एक चाय बनाने वाली कमजोर बूढ़ी औरत हो, तो जलती हुई नफरत बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।”
प्रीति जिंटा आठ साल बाद लौटी हैं, और हामिदा के रूप में “बूढ़ी औरत से चिढ़” से लेकर “उसके बिना घर की कल्पना नहीं” तक का बदलाव चुपचाप और सम्मान के साथ निभाती हैं। **करण देओल** का जावेद फिल्म का सबसे असहज किरदार है—नफरत में डूबा एक जवान, उसका गुस्सा असली है, बदलाव भी असली है, भले ही थोड़ा जल्दी हो।
## कमजोर बातें: स्क्रिप्ट कलाकारों के लायक नहीं
समस्या **निष्पादन** में है।
Navbharat Live की समीक्षा सीधी है: “भावनाएँ कोसों दूर हैं, सिर्फ भारी-भरकम डायलॉग्स तक सिमटी है।” उन्होंने **2.5 स्टार** दिए और लिखा कि फिल्म “भारी संवादों में फँसी है, किरदार और इमोशनल सीन कहानी की ताकत खत्म कर देते हैं।” TV9 Hindi ने भी “पहले हाफ की धीमी रफ्तार और कुछ किरदार फिल्म के असर को कम करते हैं” लिखा।
सबसे ज्यादा नाराजगी **सिनेमैटोग्राफी** पर है। Cinema Express लिखता है: “यह मानना मुश्किल है कि यह संतोष सिवन ने शूट किया है—कम्पोज़िशन में फिनिश और सोफिस्टिकेशन की कमी है, और विज़ुअल औसतनपन शक्तिशाली ड्रामा को डुबोने की धमकी देता है।” The Week ने भी “लाइटिंग और सेट बहुत नकली लगते हैं” कहा।
मतभेद कुछ रोए, कुछ ने नाक भौं सिकोड़ी
समीक्षाएँ दो ध्रुवों में बँटी हैं।
Filmfare ने 4/5 दिया, इसे “एक ऐसी फिल्म जो बताती है कि विभाजन के बाद क्या बचता है” कहा, और इसके मूल संदेश “नफरत ही असली दुश्मन है” को आज के भारत में “बहादुर और क्रांतिकारी” बताया। Zee News ने कहा कि यह “Gadar Border नहीं, एक इमोशनल तूफान है”, और सनी की तारीफ की कि वे “चिल्लाने वाले हीरो से रोने वाले इंसान बन गए हैं”। **Aaj Tak ने 3.5/5 दिया**, कहा “दिल भर आएगा”।
लेकिन Navbharat Live ने 2.5 स्टार दिए और Mashable India ने भी 2.5/5 देते हुए लिखा कि फिल्म “जरूरत से ज्यादा नाटकीय संवादों की वजह से लड़खड़ा जाती है”। NDTV की X रिव्यू रिपोर्ट बताती है कि कुछ दर्शकों ने इसे “संतोषी का Lajja के बाद सबसे अच्छा काम” कहा, तो कुछ ने “बहुत ज्यादा चिल्लाना, पुरानी कहानी, दूसरा हाफ धीमा और predictable” लिखा।
देखें या नहीं
अगर आप सनी देओल को एक अलग किरदार में देखना चाहते हैं, तो देखें। यह उनके करियर की सबसे संयमित, सबसे मानवीय परफॉर्मेंस में से एक है। शबाना आजमी हमेशा की तरह स्थिर हैं। फिल्म का मूल संदेश—”माँ खुद एक धर्म है, हर इंसान का पहला धर्म उसकी माँ है”—आज के भारत के संदर्भ में सचमुच हिम्मत वाली बात है।
लेकिन अगर आप बॉलीवुड की नाटकीयता और कार्टून जैसे विलेन को बर्दाश्त नहीं कर सकते, तो बीच में सब्र खत्म हो सकता है। स्क्रिप्ट की गहराई इस विषय और इन कलाकारों के लायक नहीं है। जैसा कि The Hindu का निष्कर्ष है दर्शक विभाजन की बर्बरता के प्रति स्क्रीन-डिसेंसिटाइज़ हो चुके हैं, लेकिन Batwara 1947 इस ‘बिना सेंसरशिप’ का इस्तेमाल झटका देने के लिए नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक डर बनाने के लिए करती है, और फिर सनी वाले बड़े मुक्कों की तरफ मुड़ जाती हैयह एक संरचनात्मक विरोधाभास है।”
एक लाइन में दिल गर्म है, दिमाग गड़बड़ है, सनी अच्छे हैं।

