एक लाइन में अगर आप Dhamaal सीरीज़ के पक्के फैन हैं और बिना किसी लॉजिक के सिर्फ हंसी-मज़ाक वाली मसाला फिल्म देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म अपना काम कर देती है; लेकिन अगर आप इस सीक्वल से कोई नयापन या सच में मजेदार जोक्स की उम्मीद लेकर बैठे हैं, तो ये 2 घंटे 23 मिनट आपको बार-बार घड़ी देखने पर मजबूर कर सकते हैं।
कहानी क्या है
कहानी का फॉर्मूला पहले तीनों पार्ट्स जैसा ही है। सौ साल पहले समुद्री डाकू “शैतान सिंह” ने अरबों की दौलत एक रहस्यमयी द्वीप पर छुपाई थी। वह नक्शा किसी तरह प्रित्वी देशपांडे (उपेंद्र लिमये) के हाथ लग जाता है। डाकू “अधूरा” (रवि किशन) नक्शा चुरा लेता है, लेकिन अपनी बदकिस्मती से उसे बर्बाद कर देता है। अब खज़ाने की लूट का नया दौर शुरू होता है: गुड्डू (अजय देवगन) अपने दो बच्चों और जॉनी (संजय मिश्रा) के साथ एक रास्ते पर, आदि और मानव (अर्शद वारसी और जावेद जाफरी) रोज़ी (संजीदा शेख) के साथ दूसरे पर, और लल्लन और पारो (रितेश देशमुख और अंजलि आनंद) तीसरे पर। चारों ग्रुप एक ही खज़ाने के पीछे सांप, बिच्छू, मगरमच्छ और ऑक्टोपस से भरे द्वीप पर बेतहाशा दौड़ लगाते हैं।
निर्देशक इंद्र कुमार ने इस करीब बीस साल पुरानी सीरीज़ को “नया रूप” देने की जरा भी कोशिश नहीं की। उनका तरीका सीधा है: तमाशा बड़ा करो, कार चेज़ बढ़ाओ, धमाके जोड़ो, और परोस दो।
#mअच्छी बातें पुराने कलाकारों का कॉमिक टाइमिंग अब भी काम करता है
इस फिल्म का सबसे बड़ा ताश तो कलाकारों का कॉमिक अंदाज़ ही है।
अर्शद वारसी और जावेद जाफरी की “आदि-मानव” जोड़ी आज भी फिल्म की सबसे बड़ी हंसी की गारंटी है। जब ये दोनों अपने उस पुराने “बेवकूफ, लेकिन स्वाभाविक” अंदाज़ में एक-दूसरे को फंसाने लगते हैं, तो हॉल में हंसी सच में सुनाई देती है। अर्शद वारसी को कभी “जोर लगाकर कॉमेडी करने” की जरूरत नहीं पड़ती—उनका सपाट चेहरा ही जोक को और असरदार बना देता है। जावेद जाफरी की बॉडी लैंग्वेज भी अब भी काम करती है, और कई बेतुके पलों में वही गिरती हुई लय को संभाल लेते हैं।
अजय देवगन और संजय मिश्रा की “गुड्डू-जॉनी” जोड़ी में भी ठीक-ठाक केमिस्ट्री है। अजय का काम है—उन लोगों के बीच जिनका दिमाग मिलकर भी कम पड़ता है—”थोड़ा नॉर्मल” बने रहना। उनका भावहीन चेहरा सबसे अच्छा कॉन्ट्रास्ट बनता है। संजय मिश्रा हर बात के बाद “Bro” जोड़ते हैं, जो कभी-कभी हंसी भी निकाल लेता है।
रवि किशन का “समुद्री डाकू वाला जैक स्पैरो” इस फिल्म के गिने-चुने ताज़ा एलिमेंट्स में से एक है। आंखों पर रंगीन पेंट और नुकीली टोपी—कम से कम दिखने में यह किरदार बाकी तमाशे से अलग तो लगता है।
असली दिक्कत यही है कि “वही पुराना नुस्खा” अब काम नहीं कर रहा।
जोक्स बहुत हैं, लेकिन बेहद पुराने।** कई समीक्षकों ने लिखा है कि फिल्म का पहला घंटा तेज रफ्तार से चलता है, आपको यह सोचने का मौका ही नहीं मिलता कि कहानी कितनी पतली है। लेकिन दूसरे हाफ में फॉर्मूला खुद को दोहराने लगता है—फिर एक पीछा, फिर एक गलतफहमी, फिर कोई चिल्लाता किरदार, फिर एक नामुमकिन भागना**। आखिर में जब सब लोग एक ही खज़ाने के पीछे भाग रहे होते हैं, तो आपको शक होने लगता है कि “असली खज़ाना कहीं शांति के दो पल तो नहीं थे”।
VFX और CGI की क्वालिटी शर्मनाक है।शुरुआती AI का इस्तेमाल कई दर्शकों ने “बहुत भद्दा” बताया। पूरी फिल्म में सस्ते CGI का अंबार है—बाघ, मगरमच्छ, चट्टानें, बादल, सब एक साथ ठूंस दिए गए हैं। एक समीक्षक ने तो यहां तक लिखा कि यह “बच्चों के कार्टून जैसा” लगता है।
अंजलि आनंद के शरीर को बार-बार मजाक का निशाना बनाया गया है। रितेश देशमुख का किरदार लल्लन पूरी फिल्म में “मोटी पत्नी मिलने” से डरता रहता है। यह मजाक पुराना भी है और असहज भी करता है। कई समीक्षकों ने इसे स्पष्ट रूप से “बॉडी शेमिंग” बताया।
दिवंगत अभिनेता सतीश कौशिक को “बाटा भाई” के किरदार में CGI और AI के जरिए वापस लाया गया है।** भावनात्मक लगाव तो है, लेकिन यह भी बताता है कि यह सीरीज़ अब हर जगह से “उधार” लेने लगी है।
आंकड़े झूठ नहीं बोलते: Dhamaal 4 ने भारत में 177.81 करोड़ रुपये की नेट कमाई की और वैश्विक स्तर पर करीब 236.43 करोड़ रुपये कमाए। यह Dhamaal सीरीज़ की सबसे बड़ी कमाई है और अजय देवगन की छठी सबसे ज्यादा कमाने वाली फिल्म है।पहले वीकेंड में ही इसने सीरीज़ की सबसे बड़ी ओपनिंग दर्ज की, Total Dhamaal को भी पीछे छोड़ दिया।
लेकिन व्यावसायिक सफलता एक सच छुपा नहीं सकती: इस सीरीज़ की साख गिर रही है। जैसा कि Box Office India ने लिखा, ओवरसीज़ मार्केट में फिल्म Total Dhamaal के मुकाबले सिर्फ 50% कमाई कर पाई। भारत में परफॉर्मेंस ठीक रही, लेकिन इस IP और स्टारकास्ट के हिसाब से “इसे और ज्यादा कमाना चाहिए था”।
देखें या नहीं
यह आप पर निर्भर है। अगर आप ऐसी फिल्म चाहते हैं जिसमें **दिमाग बिल्कुल न लगाना पड़े, पूरा परिवार साथ बैठकर देख सके और कभी-कभी हंसी भी आ जाए, और आपको इस सीरीज़ से पुराना लगाव है, तो Dhamaal 4अपना काम कर देती है। अर्शद वारसी और जावेद जाफरी की जोड़ी में सच में कुछ हंसी है, और अजय देवगन-संजय मिश्रा की जोड़ी भी ठीक-ठाक है।
लेकिन अगर आप “खज़ाना—पीछा—गलतफहमी—फिर पीछा” के इस चक्र से थक चुके हैं, या “मोटापे पर मजाक”, “सस्ते AI चेहरे” और “कार्टून जैसे CGI जानवरों की लड़ाई” बर्दाश्त नहीं कर सकते, तो यह फिल्म आपको बेचैन कर सकती है।
जैसा कि एक दर्शक ने X पर लिखा दिमाग बंद करो और एन्जॉय करोलेकिन शर्त यह है कि आपका दिमाग बंद हो पाए.
