अरे दोस्तों, सूर्या की ‘विश्वनाथ एंड संस’ आखिरकार आ ही गई। ‘करुप्पु’ जैसी 300 करोड़ की ब्लॉकबस्टर के बाद सूर्या एक बिल्कुल अलग रूप में लौटे हैं — इस बार कोई एक्शन नहीं, कोई सिंघम वाला गुस्सा नहीं, बल्कि एक ऐसी भावुक पारिवारिक कहानी लेकर आए हैं जो दिल को छूने की कोशिश करती है। और सच कहूं तो 18 साल बाद सूर्या को रोमांटिक अंदाज में देखना वाकई बहुत ताज़गी भरा लगता है।
तो कहानी क्या है?
फिल्म की कहानी संजय विश्वनाथ (सूर्या) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट शूटर है और बाद में एक बड़ा बिज़नेसमैन बन जाता है। 40 की उम्र में भी उसने शादी नहीं की है, क्योंकि बचपन की कुछ घटनाओं ने उसके अंदर शादी को लेकर एक गहरा डर पैदा कर दिया है। उसकी मां (राधिका शरतकुमार) उसे वारिस की चिंता में हमेशा परेशान करती रहती है। इसलिए संजय सरोगेसी के ज़रिए एक बेटा पैदा करता है।
लेकिन फिर बेटे को बोन मैरो ट्रांसप्लांट की ज़रूरत पड़ जाती है, और डोनर सिर्फ उसकी सरोगेट मदर ही हो सकती है। तो संजय अमेरिका जाकर मैडी (ममिता बैजू) को ढूंढकर लाता है। अब मैडी जब संजय के घर में रहती है, तो धीरे-धीरे उसे संजय से प्यार हो जाता है। लेकिन सवाल ये है कि क्या 40 साल का संजय 22 साल की मैडी से शादी करेगा? उसकी शादी को लेकर जो आशंकाएं हैं, क्या वो उनसे उबर पाएगा? बाकी कहानी यही बताती है।
सूर्या
सूर्या इस फिल्म में एक ऐसे इंसान की भूमिका निभा रहे हैं जो पैसों से तो अमीर है, लेकिन भावनात्मक रूप से एक कोकून में बंद है। उन्होंने इस किरदार को बड़ी संजीदगी से निभाया है। उनके चेहरे पर वो भाव कम दिखते हैं, जो असल में इस किरदार की खूबी है। ‘गजनी’ के संजय रामास्वामी की याद जरूर आती है, लेकिन यह किरदार उससे कहीं ज्यादा शांत और संयमित है।
ममिता बैजू
ममिता बैजू इस फिल्म की जान हैं। मैडी के किरदार में उन्होंने एक ऐसी लड़की को जिया है जो चुलबुली है, ज़िंदादिल है, लेकिन भावनात्मक रूप से भी गहरी है। उनकी कॉमिक टाइमिंग लाजवाब है, और सूर्या जैसे बड़े एक्टर के अपोज़िट उन्होंने खुद को कहीं कम नहीं पड़ने दिया।
राधिका शरतकुमार
राधिका ने मां के किरदार में इस फिल्म को वो भावनात्मक ज़मीन दी है जिसकी इसे ज़रूरत थी। उनके और ममिता के बीच के सीन बेहद प्यारे हैं।
रवीना टंडन
यहीं फिल्म लड़खड़ाती है। रवीना टंडन को जो किरदार मिला है, वो पूरी तरह से बेकार लिखा गया है। वो एक ऐसी सबप्लॉट का हिस्सा बन जाती हैं जो फिल्म की मुख्य कहानी से कोई ताल्लुक ही नहीं रखता।
## निर्देशन और तकनीकी पहलू
निर्देशक वेंकी अटलुरी ने ‘लकी भास्कर’ और ‘वाथी’ जैसी फिल्में बनाई हैं, और इस बार उन्होंने एक पारिवारिक ड्रामा चुना है। उनका लेखन मजबूत है, खासकर पात्रों के भावनात्मक टकराव को दिखाने में। फिल्म का पहला हाफ काफी अच्छा है — बच्चे की देखभाल, मैडी की शरारतें, मां-बेटे के सीन, सब कुछ बड़ा ताज़ा और मनोरंजक लगता है।
जीवी प्रकाश कुमार का संगीत फिल्म के मूड को बखूबी कैरी करता है। निमिष रवि की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को काफी स्टाइलिश लुक देती है।
कमजोरियाँ
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका दूसरा हाफ है। एक बार रवीना टंडन वाला ट्रैक शुरू होता है, तो फिल्म बुरी तरह ड्रैग होने लगती है। कई समीक्षकों ने इसे “ओवरस्टफ्ड सेकंड हाफ” बताया है और कहा है कि ऊटी वाला पूरा एपिसोड हटा देना चाहिए था।
सरोगेसी को लेकर फिल्म का नज़रिया भी कुछ लोगों को परेशान कर सकता है। एक यूज़र ने लिखा कि फिल्म ने सरोगेसी की अवधारणा को पूरी तरह से तोड़-मरोड़ दिया है और एक खतरनाक मिसाल कायम की है।
क्या देखें, क्या न देखें?
अगर आप सूर्या के फैन हैं और उन्हें एक अलग, शांत, रोमांटिक अवतार में देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है। ममिता बैजू का अभिनय और फिल्म का पहला हाफ इसे एक बार देखने लायक बनाते हैं। लेकिन अगर आप तेज़ रफ्तार, बेहतरीन क्लाइमैक्स और साफ-सुथरी स्क्रिप्ट वाली फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं, तो दूसरा हाफ आपको निराश कर सकता है।
निष्कर्ष
‘विश्वनाथ एंड संस’ एक ईमानदार कोशिश है। यह एक ऐसे आदमी की कहानी है जो अपने बनाए हुए कवच में कैद है, और एक लड़की की कहानी है जो उस कवच को तोड़कर अंदर आ जाती है। फिल्म कुछ जगहों पर लड़खड़ाती है, खासकर दूसरे हाफ में, लेकिन सूर्या और ममिता की केमिस्ट्री और राधिका का अभिनय इसे उबार ले जाते हैं। IMDb पर इसे 7.4 की रेटिंग मिली है, जो बताती है कि दर्शकों को यह फिल्म पसंद आ रही है।
तो अगर आप एक हल्की-फुल्की, भावनात्मक पारिवारिक फिल्म देखना चाहते हैं, तो इस वीकेंड ‘विश्वनाथ एंड संस’ ट्राई कर सकते हैं। और अगर आपने इसे देख लिया है, तो कमेंट में बताइए कि आपको कैसी लगी!

