जन नायकन मूवी रिव्यू: थलापति विजय की वो विदाई, जो अधूरी रह गई

 जन नायकन मूवी रिव्यू: थलापति विजय की वो विदाई, जो अधूरी रह गई

शुरुआत की बात करें तो

23 जुलाई 2026 को रिलीज़ हुई ‘जन नायकन’ सिर्फ़ एक फिल्म नहीं है। ये थलापति विजय के तीन दशक लंबे फिल्मी सफ़र का आख़िरी पन्ना है। सोचिए, एक ऐसा सितारा जिसने तमिल सिनेमा में अपनी अलग जगह बनाई, वो अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के तौर पर राजनीति में उतर चुका है। तो इस फिल्म पर दोहरा दबाव था — एक तरफ़ फैन्स की उम्मीद कि उनके सुपरस्टार को एक शानदार विदाई मिले, और दूसरी तरफ़ वो राजनीतिक संदेश जो विजय अपने नए किरदार में देना चाहते थे। निर्देशक एच. विनोथ की ये फिल्म असल में तेलुगु सुपरहिट ‘भगवंत केसरी’ का रीमेक है, जिसे राजनीतिक एक्शन थ्रिलर के ढाँचे में पिरोया गया है। नतीजा? एक ऐसी फिल्म जो कहीं-कहीं अपने सितारे की चमक से जगमगाती है, लेकिन कहानी और निर्माण के मामले में बुरी तरह लड़खड़ा जाती है।

कहानी और पटकथा

फिल्म की कहानी थलापति वेत्री कोंडन (विजय) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक पूर्व पुलिस अधिकारी है और बाद में कैदी बन चुका है। जेल में उसकी मुलाकात एक जेलर (गौतम वासुदेव मेनन) से होती है, जो नियम तोड़कर उसे उसकी बूढ़ी माँ से मिलवा देता है। इसी “गुनाह” की सज़ा में जेलर सस्पेंड हो जाता है। फिर एक दुर्घटना में जेलर की मौत हो जाती है, और वेत्री उसकी बेटी विजी (ममिता बैजू) की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले लेता है। विजी को पैनिक अटैक्स आते हैं, लेकिन उसके पिता का सपना था कि वो भारतीय सेना में अधिकारी बने। वेत्री उस सपने को पूरा करने की ठान लेता है।

समांतर रूप से चलती दूसरी कहानी जॉन हिमलर (बॉबी देओल) की है — एक अंतरराष्ट्रीय हथियार व्यापारी और हत्यारा, जो अफ्रीका में नरसंहार मचाने के बाद अब भारत में धार्मिक नफरत फैलाकर लोकतंत्र को कमज़ोर करने की साजिश रच रहा है। जब विजी का अपहरण होता है, तो वेत्री उसकी तलाश में निकलता है और जॉन हिमलर से उसका आमना-सामना होता है। पता चलता है कि जॉन का अतीत वेत्री से किसी गहरे तरीके से जुड़ा हुआ है। यहीं से फिल्म का वो हिस्सा शुरू होता है जहाँ कहानी राजनीतिक संदेशों की ओर मुड़ जाती है और पटकथा अपनी पकड़ खोने लगती है।

 थलापति विजय

विजय इस फिल्म में वो सब कुछ करते हैं जो उनके प्रशंसक उनसे उम्मीद करते हैं। एक्शन, डांस, डायलॉग डिलीवरी, इमोशनल सीन — सब कुछ उनके “बीस्ट मोड” में है। ‘थलापति कचेरी’ गाने में उनका डांस और फिल्म के आख़िरी कुछ मिनटों में उनके पुराने फिल्मों को श्रद्धांजलि देने वाला सीक्वेंस दर्शकों को भावुक कर देता है। लेकिन समीक्षकों का मानना है कि ये फिल्म असल में विजय के लिए एक राजनीतिक वाहन बन गई है। यहाँ विजय अभिनेता से ज़्यादा एक राजनेता के रूप में मौजूद हैं, जो हर मौके पर अपना संदेश देने से नहीं चूकते।

बॉबी देओल

बॉबी देओल को इस फिल्म में विजय के अपोज़िट एक मजबूत खलनायक के रूप में पेश किया गया है, लेकिन वे इस ज़िम्मेदारी को पूरी तरह से निभाने में नाकाम रहते हैं। हिंदी रिव्यू में उनके अभिनय को निराशाजनक बताया गया है। अंग्रेज़ी समीक्षकों ने लिखा है कि जॉन हिमलर का किरदार लगभग अनजाने में हास्यास्पद बन जाता है — वो अपने ही प्रतिबिंब से बातें करता है, और जब फिल्म आपसे उसे भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा मानने की उम्मीद करती है, तब तक आप उसे सीरियसली लेने की क्षमता खो चुके होते हैं।

 ममिता बैजू

विजी के किरदार में ममिता बैजू ने अपनी भूमिका को गरिमा और भावनात्मक गहराई दी है। कई समीक्षकों ने उनके अभिनय को फिल्म का सबसे प्रभावशाली पहलू माना है। ये किरदार आसानी से एक सजावटी भूमिका बन सकता था, लेकिन ममिता ने उसमें जान डाल दी है।

अन्य कलाकार

पूजा हेगड़े को स्क्रिप्ट में जितनी जगह मिली है, उतना ही उन्होंने किया है — ज़्यादा कुछ नहीं। प्रकाश राज और गौतम वासुदेव मेनन अपनी छोटी भूमिकाओं में प्रभावी हैं।

निर्देशन और तकनीकी पहलू

एच. विनोथ का निर्देशन

एच. विनोथ ने 2017 में ‘थीरन अधिगारम ओंद्रु’ जैसी बेहतरीन फिल्म बनाई थी, जिसमें शोध, संयमित अभिनय और एक सचमुच खतरनाक खलनायक था। ‘जन नायकन’ में वही निर्देशक अपनी पहचान से कोसों दूर दिखते हैं। सबसे बड़ी समस्या ये है कि फिल्म दो अलग-अलग फिल्मों को सिलकर बनाई गई लगती है — पहला हिस्सा ‘भगवंत केसरी’ का भावनात्मक पिता-पुत्री वाला टेम्पलेट है, और दूसरा हिस्सा एक राजनीतिक एक्शन थ्रिलर जो भारत के लोकतंत्र को बचाने की कहानी कहता है। दोनों आपस में मेल नहीं खाते।

 एआई और वीएफएक्स

ये फिल्म अपने वीएफएक्स के लिए चारों तरफ़ आलोचना की गई है। रोजर एबर्ट की समीक्षा में इसे “भयानक एपिक जो एआई इमेजरी से दर्शकों पर हमला करती है” कहा गया है। फिल्म में कई जगहों पर एआई-जनरेटेड दृश्यों का इस्तेमाल किया गया है, जिनमें रोबोट कुत्ते, लेजर-ब्लास्टिंग एंड्रॉइड्स और एआई-जनरेटेड एक्स्ट्राज़ शामिल हैं। एक बड़े बजट की फिल्म के लिए ये तकनीकी स्तर बेहद निराशाजनक है। क्लाइमैक्स का एक्शन सीक्वेंस वीडियो गेम जैसा लगता है, जो जॉन हिमलर को एक वैश्विक खतरे के रूप में स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहता है।

एनिरुद्ध का संगीत

एनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड स्कोर इस फिल्म का सबसे मजबूत तत्व है। कई समीक्षकों ने माना कि अगर एनिरुद्ध का संगीत न होता, तो कई सीन पूरी तरह से बेअसर हो जाते। ‘थलापति कचेरी’ और ‘कन्ने मनिये’ जैसे गाने फिल्म के भावनात्मक और मास-अपील वाले क्षणों को ऊपर उठाते हैं।

राजनीतिक संदेश और विषय-वस्तु

‘जन नायकन’ एक राजनीतिक फिल्म है, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश बहस या संवाद के बजाय भोंपू (मेगाफोन) के ज़रिए दिया जाता है। वेत्री हर उस मुद्दे पर बोलता है जो राजनीतिक उदासीनता से जुड़ा है, लेकिन बारीक चर्चा के लिए कोई जगह नहीं है। फिल्म में एमजीआर को श्रद्धांजलि, संविधान की प्रति उठाने वाला शॉट, और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में विजय का टाइटल कार्ड जैसे क्षण साफ़ तौर पर उनके राजनीतिक करियर को मज़बूत करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। समीक्षकों का मानना है कि ये फिल्म “अपने समय से एक दशक पीछे” लगती है, और इसके राजनीतिक संदेश में वो तीखापन नहीं है जो आज के दौर में ज़रूरी है।

 बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन

लगभग 350-375 करोड़ रुपये के बजट में बनी ये फिल्म अपनी लागत वसूलने में नाकाम रही। इसका वर्ल्डवाइड ग्रॉस लगभग 327.2 करोड़ रुपये रहा। भारत में इसने 198.32 करोड़ नेट कमाया, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा तमिलनाडु का था (लगभग 146 करोड़)। विदेशों में इसने 93.15 करोड़ ग्रॉस कमाया। ये फिल्म कोल्लीवुड की 10वीं सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई, लेकिन एक विजय फिल्म के लिए ये आँकड़े उम्मीद से कम हैं। दिलचस्प बात ये है कि रिलीज़ में देरी, ऑनलाइन लीक और मिश्रित समीक्षाओं के बावजूद फिल्म ने 300 करोड़ का आँकड़ा पार किया — ये सिर्फ़ विजय के सुपरस्टारडम का सबूत है।

क्या देखें, क्या न देखें?

अगर आप विजय के प्रशंसक हैं, तो ये फिल्म आपके लिए एक भावनात्मक विदाई है। उनकी एंट्री, डांस, एक्शन और आख़िरी श्रद्धांजलि वाला सीक्वेंस आपको सिनेमाघर में सीटी बजाने और तालियाँ बजाने पर मजबूर कर देगा। लेकिन अगर आप एक सुसंगत, अच्छी तरह से लिखी और तकनीकी रूप से प्रभावशाली फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं, तो ‘जन नायकन’ आपको निराश करेगी। पटकथा की खामियाँ, खराब वीएफएक्स और एआई इमेजरी, और बहुत लंबा रनटाइम (183 मिनट) इसे एक थकाऊ अनुभव बना देते हैं।

 निष्कर्ष

‘जन नायकन’ एक ऐसी फिल्म है जो अपने सितारे के वज़न को उठाने में सक्षम नहीं है। विजय ने अपनी भूमिका पूरी निष्ठा से निभाई है, लेकिन निर्देशक और पटकथा उन्हें वो सामग्री देने में विफल रहे जिसके वे हकदार थे। ये फिल्म एक साथ दो कहानियाँ कहना चाहती है — एक भावनात्मक पिता-पुत्री की कहानी और एक राजनीतिक थ्रिलर — लेकिन दोनों में से कोई भी पूरी तरह से काम नहीं कर पाती। तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक के लिए ये एक अधूरी विदाई है — ऐसी विदाई जिसमें जश्न भी है और अफ़सोस भी।

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