महाकाव्य श्री रामायण कथा रिव्यू ईमानदार कोशिश, लेकिन VFX और एक्टिंग ने डुबोया रामायण का असर

महाकाव्य श्री रामायण कथा रिव्यू ईमानदार कोशिश, लेकिन VFX और एक्टिंग ने डुबोया रामायण का असर

फिल्म का परिचय

महाकाव्य श्री रामायण कथा 25 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। डायरेक्टर अभिषेक सिंह ने रामायण की पौराणिक कथा को बड़े पर्दे पर उतारने की कोशिश की है। फिल्म में देव शर्मा भगवान राम, अंजलि अरोड़ा माता सीता, राजनीश दुग्गल रावण, शील वर्मा लक्ष्मण और निर्भय वाधवा हनुमान जी के किरदार में नजर आ रहे हैं।

सच कहूं तो इस फिल्म को देखते समय बार-बार यही एहसास होता रहा कि इसे बनाने वालों की नीयत साफ थी, लेकिन जिस तरह से इसे परदे पर उतारा गया, वह पूरी तरह से चौंकाने वाला है—और बुरे मायने में।

 कहानी क्या है?

फिल्म की शुरुआत अयोध्या से होती है, जहां एक बच्चा शाश्वत अपने परिवार के साथ आता है। परिवार मंदिर दर्शन के लिए चला जाता है, लेकिन शाश्वत वहीं रुक जाता है। यहीं उसकी मुलाकात एक साधु से होती है, जो उसे रामायण की कहानी सुनाना शुरू करता है।

इसके बाद कहानी रामायण के सभी अहम पड़ावों से गुजरती है। सीता स्वयंवर, भगवान राम का चौदह साल का वनवास, सीता हरण, हनुमान जी की भक्ति, सेतु निर्माण और लंका में रावण के साथ धर्म-अधर्म का महायुद्ध। फिल्म का अंत राम के अयोध्या लौटने के साथ होता है।

क्या अच्छा है फिल्म में?

भक्ति संगीत और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की सबसे मजबूत ताकत है। आशीष और देव का संगीत कई जगहों पर दिल छू लेता है। खासकर रावण द्वारा शिव की स्तुति करने वाला सीक्वेंस काफी प्रभावशाली है। फिल्म में कैलाश खेर, जावेद अली और शान जैसे गायकों ने अपनी आवाज दी है। यही वह हिस्सा है जहां आपको थोड़ी देर के लिए लगता है कि हां, कुछ तो बात है।

फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें रामायण की मर्यादा को बनाए रखने की कोशिश की गई है। यहाँ हनुमान जी कोई बॉम्बे स्लैंग नहीं बोलते, न ही सीता कोनों में डांस करती नजर आती हैं। कॉस्ट्यूम भी पारंपरिक और सभ्य हैं। कई समीक्षकों ने माना है कि यह फिल्म आदिपुरुष से बेहतर है, क्योंकि इसने रामायण की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई। कम से कम यहां आपको यह शिकायत नहीं होगी कि बनाने वालों ने कथा का मजाक बना दिया।

देव शर्मा ने राम के किरदार में ईमानदार कोशिश की है। उनकी सादगी और ग्रेस कुछ सीन्स में काम करती है। राजनीश दुग्गल का रावण लुक के मामले में आकर्षक है और उन्हें स्क्रीन पर सबसे ज्यादा स्पेस मिला है। कम से कम उनका रावण स्क्रीन पर मौजूद तो लगता है।

 क्या खराब है फिल्म में?

सबसे बड़ी समस्या है फिल्म का VFX यह इतना कमजोर है कि कई जगहों पर यह टीवी सीरियल जैसा लगता है। रामायण जैसी भव्य कहानी में जहां दर्शक शानदार युद्ध दृश्यों और राक्षसों की उम्मीद करते हैं, वहां स्क्रीन पर कुछ ऐसा दिखता है जो मजाक बना देता है। मैंने अपनी आंखों पर यकीन नहीं किया जब युद्ध के दृश्य में एक्टर का सेफ्टी हार्नेस साफ-साफ दिखाई दे रहा था।

कई शर्मनाक गलतियाँ भी सामने आई हैं। वानर सेना के एक किरदार ने चश्मा पहन रखा है। किसी वानर के एब्स पेंसिल से बने हुए लगते हैं। सीता हरण, सेतु निर्माण और लंका दहन जैसे महत्वपूर्ण सीन्स VFX की वजह से बेअसर हो गए हैं। आप इन दृश्यों को देखकर भावुक होने के बजाय हंसने लगते हैं, और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी त्रासदी है।

स्क्रीनप्ले बेहद कमजोर है पूरी रामायण को तीन घंटे में समेटने की कोशिश में फिल्म कहीं भी भावनात्मक गहराई नहीं बना पाती। एक घटना से दूसरी घटना पर कूदती है, जिससे किरदारों के लिए जुड़ाव महसूस नहीं होता। महत्वपूर्ण किरदार अचानक प्रकट होते हैं और दर्शक संवादों से अंदाजा लगाते हैं कि यह कौन है। मुझे तो कई बार लगा कि काश, फिल्म को दो हिस्सों में बनाया गया होता तो शायद कहानी को सांस लेने का मौका मिलता।

एक्टिंग भी कमजोर है। अंजलि अरोड़ा सीता के किरदार में भावनात्मक सीन्स में कमजोर साबित होती हैं। शील वर्मा लक्ष्मण के रूप में बेजान लगते हैं। राजनीश दुग्गल का रावण असरदार होने के बजाय ‘हीरोइक’ ज्यादा लगता है। रावण की वह आभा और खौफ कहीं नजर नहीं आता जो इस किरदार की पहचान है। यहां रावण विलेन से ज्यादा हीरो लगता है, जो कथा की मूल भावना के खिलाफ जाता है।

बॉक्स ऑफिस का हाल

महाकाव्य श्री रामायण कथा ने बॉक्स ऑफिस पर **बेहद निराशाजनक शुरुआत** की है। पहले दिन का कलेक्शन सिर्फ 10 से 14 लाख रुपये के आसपास रहा। कुछ रिपोर्ट्स में 23,700 रुपये का भी जिक्र है। फिल्म को देशभर में सिर्फ 500 से 600 शोज मिले। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि फिल्म को दर्शकों का सपोर्ट नहीं मिल पाया। एक ऐसी फिल्म के लिए, जिसे इतने बड़े स्तर पर बनाया गया है, यह आंकड़े किसी सदमे से कम नहीं हैं।

 निष्कर्ष

महाकाव्य श्री रामायण कथा एक  ईमानदार कोशिश है, लेकिन कमजोर निष्पादन के साथ। मेकर्स ने रामायण की गरिमा को बनाए रखने की पूरी कोशिश की है, जो तारीफ के काबिल है। लेकिन अगर आप सिनेमाई अनुभव की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो आपको निराशा ही मिलेगी। VFX की गुणवत्ता, कमजोर स्क्रीनप्ले और अधूरी एक्टिंग इसे बड़े पर्दे के लिए अयोग्य साबित करती है। कुल मिलाकर यह एक ऐसी फिल्म है जिसे आप टीवी पर एक बार देख सकते हैं, लेकिन सिनेमाघर का टिकट खरीदने से पहले दस बार सोच लें।

रेटिंग: 2.5/5

अगर आप रामायण की कहानी को सिर्फ भक्ति भाव से देखना चाहते हैं और तकनीकी पहलुओं को नजरअंदाज कर सकते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए हो सकती है। लेकिन अगर आप एक अच्छी फिल्म की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो 1987 वाली रामायण टीवी सीरियल आज भी बेहतर विकल्प है। कुछ चीजें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, और रामानंद सागर की रामायण उनमें से एक है।

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