नानी की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘द पैराडाइज़’ आखिरकार सिनेमाघरों में आ गई है। ‘दसरा’ के बाद डायरेक्टर श्रीकांत ओडेला और नानी की जोड़ी से दर्शकों को बहुत उम्मीदें थीं। फिल्म का टीज़र और नानी का लुक भी खूब चर्चा में रहा। लेकिन असली सवाल यही है—क्या यह फिल्म उन उम्मीदों पर खरी उतरी, जो एक बड़े स्टार और बड़े बजट की फिल्म से की जाती हैं? चलिए, पूरी डिटेल में समझते हैं।
कहानी क्या है?
फिल्म की कहानी 1980 के दशक के सिकंदराबाद में सेट है। यहां ‘पैराडाइज़’ नाम की एक बस्ती है, जहां सवारी समुदाय के लोग रहते हैं। नाम सुनकर लगता है जैसे स्वर्ग हो, लेकिन इन लोगों की जिंदगी नरक से कम नहीं है। आजादी के इतने सालों बाद भी इनके पास कोई पहचान पत्र नहीं है। सरकारी कागजों में इनका कोई वजूद ही नहीं है। इनका ‘भगवान’ मलिक (मोहन बाबू) है, जो एक बेरहम और ताकतवर जमींदार है। वह इस पूरे समुदाय को अपना गुलाम समझता है और उन पर जुल्म ढाता है।
इसी समुदाय से जदल (नानी) आता है। जदल को बचपन में ही जेल जाना पड़ता है। उसकी अपनी मां (सोनाली कुलकर्णी) से नफरत है। लेकिन जब वह 14 साल बाद जेल से बाहर आता है, तो हालात ऐसे बनते हैं कि उसे मलिक से बदला लेना पड़ता है। जदल का यह निजी बदला धीरे-धीरे पूरे सवारी समुदाय के लिए हक, सम्मान और पहचान की लड़ाई बन जाता है।
नानी का अवतार और स्क्रीन प्रेजेंस
इस फिल्म में नानी को उनके करियर के सबसे अलग और आक्रामक अवतार में देखा जा सकता है। ‘नेचुरल स्टार’ वाली उनकी आम छवि से हटकर यहां वह लार्जर-देन-लाइफ एक्शन हीरो बनने की कोशिश करते हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज और आंखों में दिखने वाला गुस्सा कुछ सीन्स में काफी असरदार लगता है। खासकर एक्शन सीक्वेंस में नानी ने अपनी पूरी ताकत झोंकी है। हालांकि, कहानी कमजोर होने की वजह से उनकी यह मेहनत पूरी तरह से परदे पर नहीं उतर पाती।
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या: घिसी-पिटी कहानी
‘द पैराडाइज़’ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसकी कहानी बेहद अनुमानित है। डायरेक्टर श्रीकांत ओडेला भले ही इसे रियल-लाइफ घटनाओं से प्रेरित बताते हों, लेकिन परदे पर यह वही पुरानी कहानी लगती है जिसे हम ‘पेड्डी’, ‘किंगडम’ और ‘केजीएफ’ जैसी कई फिल्मों में देख चुके हैं। एक शोषित समुदाय, एक अत्याचारी विलेन, और उसके खिलाफ उठ खड़ा होने वाला एक गुस्सैल हीरो। कहानी का ट्रीटमेंट भी उतना ही पुराना है, जिससे आप आगे क्या होने वाला है, यह पहले ही अंदाजा लगा लेते हैं।
विलेन बना कमजोर कड़ी
किसी भी रिवेंज ड्रामा की जान उसका विलेन होता है, लेकिन ‘द पैराडाइज़’ में विलेन बेहद कमजोर साबित होता है। मोहन बाबू ने शिकंजा मलिक का किरदार निभाया है, लेकिन ज्यादातर समय वह स्क्रीन से गायब ही रहता है। राघव जुयाल का किरदार विक्रम मलिक ‘आवेशम’ के रंगन्ना की सस्ती कॉपी जैसा लगता है। हीरो और विलेन के बीच कोई मजबूत फेस-ऑफ सीन नहीं है, जो कहानी की सबसे बड़ी जरूरत थी। जब विलेन कमजोर होता है, तो कहानी भी कमजोर हो जाती है।
कायदू लोहार का किरदार और विवाद
फिल्म में कायदू लोहार ने सुब्बू का किरदार निभाया है। सुब्बू एक गरीब परिवार की लड़की है, जो जीवित रहने के लिए खुद के वीडियो बनाकर बेचती है। समीक्षकों का मानना है कि फिल्म ने इस किरदार को बेहद सतही तरीके से पेश किया है। फिल्म यह कभी नहीं बताती कि वह ऐसा क्यों कर रही है। उसकी कोई आंतरिक दुनिया, कोई संघर्ष या कोई एजेंसी नहीं दिखाई गई। कई आलोचकों का मानना है कि सुब्बू का पूरा सबप्लॉट सिर्फ फिल्म को विजुअल ‘आई कैंडी’ देने के लिए जोड़ा गया है। अगर इस किरदार को पूरी तरह हटा भी दिया जाए, तो कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
हिंसा की अति और भावनाओं की कमी
‘द पैराडाइज़’ में हिंसा और खून-खराबे की भरमार है। कई दर्शकों और समीक्षकों ने इसे ‘ज़रूरत से ज्यादा’ बताया है। फिल्म में शोषित समुदाय को बार-बार अपमानित, प्रताड़ित और प्रताड़ित होते दिखाया गया है, लेकिन इन सीन्स को जरूरी भावनात्मक या राजनीतिक संदर्भ नहीं दिया गया। नतीजा यह है कि अत्याचार एक ‘एस्थेटिक’ बनकर रह जाता है। कैमरा दर्द पर, शरीर पर और खून पर ज्यादा देर तक रुकता है, लेकिन लेखन किरदारों को उतनी गहराई नहीं दे पाता कि वह दर्द महसूस हो। एक ऐसी फिल्म जो कथित तौर पर शोषित समुदाय के बारे में है, वह उसी समुदाय को सिर्फ हिंसा के कैनवास की तरह इस्तेमाल करती है।
टेक्निकल पहलू: कुछ चीजें अच्छी, कुछ बिखरी
फिल्म के टेक्निकल डिपार्टमेंट में मिक्स्ड रिएक्शन हैं। प्रोडक्शन डिज़ाइन शानदार है। 1980 के दशक का सिकंदराबाद और ‘पैराडाइज़’ बस्ती को बड़े ही बारीकी से परदे पर उतारा गया है। सिनेमेटोग्राफी भी कुछ जगहों पर काफी प्रभावशाली है। लेकिन एडिटिंग कमजोर है। फिल्म को कई चैप्टर्स में बांटा गया है, लेकिन ये चैप्टर आपस में जुड़ते नहीं लगते। इससे पूरी कहानी बिखरी हुई महसूस होती है। अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड स्कोर भी कहीं-कहीं अच्छा है, लेकिन हर जगह काम नहीं कर पाता।
बॉक्स ऑफिस और दर्शकों का रिएक्शन
मिली-जुली समीक्षाओं के बावजूद ‘द पैराडाइज़’ ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार शुरुआत की है। फिल्म ने पहले दिन दुनिया भर में करीब 77 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन किया है। यह नानी के करियर की सबसे बड़ी ओपनिंग है। हालांकि, सोशल मीडिया पर कई दर्शकों ने इसे ‘एपिक डिजास्टर’ तक कहा है। कुछ लोगों ने फिल्म के दूसरे हाफ को बेहद कमजोर बताया है। कुछ ने इसे ‘केजीएफ’ की कॉपी बताया है। फिल्म को लेकर दर्शकों की राय बंटी हुई है।
क्या देखें या नहीं?
अगर आप नानी के फैन हैं और उन्हें एक अलग अवतार में देखना चाहते हैं, तो आप ‘द पैराडाइज़’ देख सकते हैं। अगर आपको बड़े स्केल पर बनी एक्शन फिल्में पसंद हैं और कहानी की कमियों को नजरअंदाज कर सकते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए हो सकती है। लेकिन अगर आप एक मजबूत कहानी, गहरे किरदार और भावनात्मक जुड़ाव की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। फिल्म अपनी अति-महत्वाकांक्षा और कमजोर लेखन के चलते वह असर नहीं छोड़ पाती, जो एक अच्छी फिल्म छोड़ती है।
निष्कर्ष
‘द पैराडाइज़’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें एक बड़े स्टार की मेहनत, शानदार प्रोडक्शन डिज़ाइन और कुछ दमदार एक्शन सीक्वेंस हैं। लेकिन यह सब एक कमजोर और अनुमानित कहानी की भेंट चढ़ जाता है। डायरेक्टर श्रीकांत ओडेला ‘दसरा’ की सफलता को दोहराने की कोशिश में कहीं खो से गए हैं। फिल्म की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यह एक गंभीर विषय को सिर्फ तमाशा बना देती है। शोषण और संघर्ष की कहानी को संवेदनशीलता से कहने की जरूरत होती है, लेकिन यहां सब कुछ हिंसा और खून के पीछे छिप जाता है। अगर आप सिर्फ नानी को एक्शन में देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए ठीक है। लेकिन एक अच्छी सिनेमाई अनुभव की तलाश में जा रहे दर्शकों को यह फिल्म निराश कर सकती है।

